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देवस्थान उत्सव

About Daily Worship...

श्री त्र्यंबकराज के आरे मे जो भी इतिहास उपलब्ध हुआ है उस इतिहासके आधारके अनुसार ऐसा माना जाता है कि लगभग ३५० सालोंसे श्री त्र्यंबकराजकी त्रिकाल पूजा श्री त्र्यंबकेश्वर देवस्थानकी औरसे तय किये गये उसुलोंके अनुसार किये जाते है। यह तो बडी ताज्जुबकी बात हो सकती है कि पूरे भारतवर्षमें त्र्यंबकराज जैसी त्रिकाल तांत्रिक अर्चन पूजा कही भी नही होती. इस तरह की पूजा पघ्दती पहलेपहल काश्मिरमे ही शुरू हुई थी, और कौल संप्रदायके अनुसार चलती आयी हुई है।

इ.स. पूर्व २००० बरसोंसे इस कौल संप्रदायकी शुरुवात हुई है। इसमे कूल अधिक अकुल का मतलब म्हणजेच कौल होता है। शिवशक्तिकी अध्ययनपूर्वक उपासना करने के बाद ही मानव परमेश्वर प्राप्तीकी अंतिम मंझिल तक पहुँचता है। परमेश्वर प्राप्तीही इस उपासनाका प्रमुख्य उद्देश रहा है। साधना की इसी पध्दतीमें साधक, स्वयंम, शिवरूप बनकर स्वंयकी पूजा परमेश्वर समझकर करता रहता है। मतलब शिंवभुत्वा शिवंयजेत ऐसी स्थितीका एहसास स्वंयम साधक ही महसूस करता रहता है। इसी सिलसिलेमे वसुगुप्त नामका परम शिवभक्त था। उसे साक्षात भगवान शिवजीने सपनेमे दृष्टांत देकर हिमालयमें एक शीलेपर ग्यान लिखा हुआ है ऐसे जताया। भगवान शिवजीके दिये हुए दृष्टांतके अनुसार वसुगुप्त उसी जगहपर पहुँचे जहाँ उन्हे शीलापर लिखी हुई ग्यान की प्राप्ती हुई। वही ग्यान आज स्पंद करिका नामसे मशहूर है। यही ग्यान कौल संप्रदायसे ही प्राप्त हुआ है। साथ साथ इस स्पंदकारिकामे अध्यात्म शास्त्रका बहुतही गुह्य एवं रहस्यपूर्ण ग्यान बताया गया है। इस ग्यानको पढनेकी जिन जिज्ञासुओंमें उत्कंठा हो उन जिज्ञासू साधकोने इसे पढकर इसका अध्ययन जरूर करना चाहिए। अर्थात इसके लिये उन्हे स्पंदकारिकेकर अध्ययन करना होगा।

पेशवे कालसेही पेशवोंने इन्ही त्रिकाल पूजा अव्याहत तथा निरंतर शुरू रहनेके लिये श्री त्र्यंबकेश्वर देवस्थानकी निर्मिती की, और इन्ही त्रिकाल पूजा अबाधित रूपसे शुरू रहनेके लिये वैसा इन्तजाम भी किया। पेशवाईके बाद ब्रिटीश सरकार का राज था और जैसा ही भारत देश ब्रिटीश सरकारके चंगुलसे आजाद हुआ वहाँसे लेकर आजतक इन्ही त्रिकाल पूजा परंपरासे चल रही है। प्रात:कालकी पूजाकी दशपुत्रे घराने के लोग करते है। माध्यान्ह एवं दोपहरके समय पूजा शुक्ल घराने के लोग करते है। तथा सायंपूजा तेलंग घरानेके लोग करते है। जो वंशपरंपरासे चलती आयी हुई थी। इन तीनों त्रिकाल पूजाके के लिये तीनही समयपर देवस्थानकी तरफसे भगवानके लिये भोग साथ साथ पूजासाहित्य और शागीर्द का इन्तजाम किया गया है। ग्रहणकालके वक्तपर महाशिवरात्रीके और वैकुंठचतुर्दशीके शुभ अवसरपर साथ सार्थ पर्वकालमे विशेष पूजा संपन्न होती रहती है।


श्री. त्र्यंबकेश्वर संस्थानके निरामय आनंद देनेवाले त्योहार


चैत्र

हिंदु धर्मीयोंमें वर्षप्रतिपदा का त्यौहार अपनी खासीयत को लेकर आता है। वर्षारंभका शुभ दिन चैत्र पाडवा जिसे गुढीपाडवा संज्ञासे जाना जाता है, पहचाना जाता है। इसी चैत्र पाडवाके प्रतिपदाके शुभ अवसरपर सुबह पाँच बजे श्री. त्र्यंकबेश्वरकी विशेष पूजा रहती है, जो देवालयके विश्वस्तके हाथोंसे संपन्न होती है। शाम की बेला मे भगवान शिवजीकी सवारी निकलती है। पूरे त्र्यंबकेश्वर संस्थानमे सजाई हुई गुढी लगाई जाती है। ठीक उसी दिन ग्रामजोशी पंचांग पठन करते है।


बैशाख

बैशाख तृतीयाके दिनपर मतलब अक्षयतृतीयाके शुभदिनपर श्री. त्र्यंबकराज मंदिर स्थित हर्ष महल खुला किया जाता है।


सावन

सावन महिनेमें आनेवाले नागपंचमी और नारलीपूजन के दिन अर्थात रक्षाबंधन जैसे धूमधामसे मनाये जानेवाले त्यौहारके दिन श्री. भगवान शिवजीको भरजरी रेशमी, मुलायम वस्त्र चढाये जाते है। पिठोरी अमावसके दिनपर बैलजोडीको सजाधजाकर उनका पूरी तरहसे साजशृंगार करके जुलूस निकाला जाता है।


भाद्रपद

भाद्रपद महिनेमे आनेवाले गणेश चतुर्थीके शुभअवसरपर वहाँके विश्वस्तोंके हाथो पार्थिव गणेश मूर्तिकी पूजा की जाती हैऔर मूल नक्षत्रके समयपर गणेश मृर्तिका विसर्जन किया जाता है।


अश्विन

अश्विन शुध्द अष्टमीके शुभअवसरपर भुवनेश्वरी, कोलंबिका, निलंबिका आदि देवीयोंका पूजन किया जाता है। साथ साथ अन्य दूसरे देवीदेवताओंकी पूजा की जाती है। सुबहकी मंगल बेलामे ५ बजे विश्वस्तोंके हाथो विशेष पूजन किया जाता है। दशहरके दिन शाम ४ बजे भगवान शिवजीकी सवारी सिमोल्लंघनके लिये निकलती है। दिपावलीमें आनेवाले नरकचतुर्थीके सुबह ५ बजे श्री त्र्यंबकेश्वरकी विश्वस्तोंके हाथो विशेष पूजा संपन्न हो जाती है। शाम ५ बजेकी मंगल बेलामे श्री. त्र्यंबकराज मंदिरमे भगवान शिवजीका मुखौटा पिंडीपर रखा जाता है। भगवान शिवजीको भरजरी वस्त्र चढाये जाते है।


कार्तिक

कार्तिक त्रयोदशी,चर्तुदशी और पौर्णिमाके तीन दिनतक संकीर्तन किया जाता है। वैकुंठ चर्तुदशीके दिन रातके समय भगवान शिवजीकी विशेष पूजा की जाती है। पौर्णिमाके दिन शाम ४ बजे श्री. त्र्यंबकराज रथपे विराजमान होकर जुलूस निकाला जाता है। कुशावर्त तीर्थपर पूजा की जाती है। मंदिरमे रथयात्रा वापस आनेके बाद शाम ७.३० बजे दीपमालाकी विधीवत पूजा की जाती है, और पूजाके उपरान्तं दीपमाला प्रज्वलित की जाती है। दीपमालाकी पूजा श्री. रुईकरजीके मार्गदर्शनमे की जाती है।


माघ

माघ शुध्द पंचमीके दिन बसंतपंचमी के दिन भगवान शिवजीको भरजरी वस्त्र पहनाये जाते है। महाशिवरात्री के दिन दोपहर ३ बजे भगवान शिवजीकी पालकी का जुलूस पूरे गाँवमे निकाला जाता है। रातके समय दस बजेसे बारह बजेतक भगवानके नामका संकीर्तन किया जाता है।


फाल्गुन

फाल्गुन पौर्णिमाके दिन होलिका पूजन किया जाता है। धुलीवंदनके दिन भगवान शिवजीको भरजरी वस्त्र चढाये जाते है। रंगपंचमी के दिन भगवान शिवजीपर रंग चढाये जाते है।

हर सोमवारके दिन श्री. त्र्यंबकेश्वरकी पालकीसे जुलूस निकाला जाता है। बादमे कुशावर्त तीर्थपर शिवजीकी पूजा की जाती है।

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