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कुंभमेला २०१५-१६

पूरे समुचे भारतवर्षमें चार प्रधान स्थानोंपर कुंभमेला संपन्न होता रहता है। जिसकी अपनी विशेष पहचान है। कुंभमेला एवं कुंभपर्वकी अनुभूती लेनेकी चाहत हर किसीके दिलोदिमागपर छायी हुई रहती है। कुंभमेलेमें शरीक होकर उन नदीयोंके पवित्र एवं शीतल जलधारामें स्नान करना यही बात हर किसी इन्सानके लिये बहुत ही पुण्यकारक मानी जाती है। हर किसी इन्सानको पापोंसे मुक्ती दिलाकर पुण्य प्रदान करनेवाला कुंभमेला भारतमे चार प्रधान स्थानोंपर संपन्न होता है। जिनके नाम है हरिद्वार, अलाहाबाद, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर, नाशिक. इसी कुंभमेलेके सिलसिलेमे एक आख्यायिका बतलायी जाती है। जो इस तरह अवसर आमतौरपर हर इन्सानको मालूम होती है।.....

प्राचीन कालमे सूर और असुरोने क्षिर सागरका मंथन किया उस मंथनसे १४ रत्नोंकी प्राप्ती हुई और उसके उपरान्त जब सागरमंथनसे अमृतकलश मिल गया और अब इसी अमृतकुंभकी प्राप्ती के लिये सूर और असूर इन दोनोंमे घमासान युध्द शुरू हो गया। सुरोंके अधिपती राजा इंद्रके बेटे जयंतने उस अमृतकलश को हाथमे लेकर तेजीसे भागना शुरू किया। एक दुसरे पर हावी होनेकी ईर्षासे अब असूर इंद्रपुत्र जयंतका पीछा अमृतकलशकी प्राप्तीके लिये करने लग गये। सुर और असूरोंकी खीचातानीमें जिन जिन जगहपर अमृतकुंभ रखा गया, जिन चार जगहोंपर अमृत की बूंदे गिरी पडी. उन्ही पवित्र एवं पावन स्थानोंपर कुंभमेला संपन्न होता रहता है। जहाँ जहाँ अतृतकलश रखा गया अब उसी स्थानपर कुंभमेला संपन्न होता रहता है। जो हिंदु धर्मियोंके लिये अपरंपार श्रध्दाका एवं अनन्यसाधारण महत्व रखता है। ऐसे कठीण समयपर अमृतकलश भंग ना पाये इसीके लिये सूर्यदेवताने उस कलश की रक्षा की। अमृतकलशमें रहा अमृत कही सूख ना जाये इस बातकी निगरानी स्वयंम चंद्रमाने की और इसके साथ साथ केवल इंद्रपुत्र जयंत खुद सारा अमृत पीनेकी कोशीश ना करे इसकी खबदारी शनीने उठायी. ऐसा अवसर कहा जाता है या यूँ कहो की ऐसी बात सौफीसदी मानी गयी है की अमृतकुंभकी रक्षा करते समय सूर्यदेवता,चंद्रमा और बृहस्पति जिन राशीयोंमे भ्रमण कर रहे थे वही समय जब कभी दोहराया जाता है। उसी जगहपर कुंभमेला संपन्न होता है। इसी सिलसिलेमे स्कंदपुराण, ब्रम्हपुराण और पद्मपुराण इन पुराणग्रंथोमे समग्र जानकारी दी गयी है। हरिद्वार, इलाहाबाद, या फिर उज्जैन जैसे पवित्र स्थलोंपर संपन्न होनेवाले ऐसे सुयोगपर रहनेवाले मेलेको सिर्फ कुंभमेलेके नामसे जाना जाता है। लेकिन जिस समय त्र्यंबकेश्वर और नासिकमें कुंभमेला संपन्न होता है। तब उसी समय गुरू, सूर्यदेवता, और चंद्रमा ये तीनों ग्रह सिंह राशीमे होनेके कारण ही इसे सिंहस्थ कुंभमेला कहते है। जैसे ही गुरु ग्रह सिंह राशीमे प्रविष्ट होता है उस कालावधीको सिंहस्थ कुंभमेला इस नामसे जाता जाता है। और जिस समय सूर्यदेवता, चंद्रमा और बृहस्पती ये तीनों ग्रह सिंह राशीमें प्रविष्ट होते है, वही दिन महापर्वणीके नामसे महापर्वणी इस संज्ञासे पहेचाना जाता है। ग्रहोंकी ऐसी स्थिती सावनमहिनेके अमावसके दिनमेही होती है।

सिंहस्थ पर्वकालमे पवित्र गोदावरी नदीकी शीतल जलधारामें स्नान करना यही बात विशेष पुण्यकारक तथा पुण्यप्रद समझी जाती है। सिंहस्थ काल इतना शुभ समझा जाता है कि सिर्फ एकही दिन भले क्यों ना हो गोदावरी नदीके जलधारामें स्नान करनेसे कुल मिलाकर यकीनन साठ हजार बरसतक गंगा नदीमें स्नान करनेका पुण्य मिलता है। सिंह राशी मे जब गुरू ग्रह प्रविष्ट होता है उस माघ शुध्द दशमीको गंगा गोदावरी नदी इस धरतीपर अवतरीत हुई है। गौतम ऋषीको गोहत्याके पापसे मुक्ती दिलाने के बाद गंगा वापस अपने मूलस्थानपर भगवान शिवजीकी जटामे जा रही थी। लेकिन धरतीपर रहनेवाले लोगोंका कल्याण होने के लिये उसे धरतीपर रहनेका आदेश भगवान शिवजीने दिया। तग लोगोके पापोंका नाश करते करते मै स्वयंम मलिन हो जाऊँगी तब मै क्या करू यह सवाल भगवान शिवजीको गंगाने किया था। भगवान शिवजीने तुरंत जवाब देते हुए सभी देवदेवताओंको सभी बहनेवाली पवित्र नदीयोंको तीर्थस्थानेंका सरोवर एवं तालाबोंको आदेश दिया कि जबतर सिंह राशीमे गुरु ग्रह प्रविष्ट होता है उस कालावधीमें हम सभी इस धरतीपर अवश्य निवास करेंगे और यहाँ रहकर रोज गोदावरीमें स्नान करके त्र्यंबकेश्वरजीके पूजन और दर्शन जरूर करेंगे। भगवान शिवजीको सभी ऋषीमुनीयोंने पवित्र नदीयोंने जिस तरह वचन दिया उस वचनके मुताबिक वही रिवाज उस कालसे लेकर आजतक चलता आया है। सभी साधू संत महात्मा पर्वणीके दिन कुशावर्त तीर्थमें स्नान करनेके बाद २री त्र्यंबकेश्वरके पुनीत ण्वंमंगल दर्शन लेनेके लिये जाते रहते है। दुसरी जगह हरिद्वार, इलाहाबाद, तथा उज्जैनमें इन तीन जगहपर कुंभमेलेके समय सिर्फ स्नान किये जाते है। लेकिन यहॉपर स्नान करनेके उपरान्त त्र्यंबकेश्वरस्थित भगवान शिवजीके दर्शन करनेकी परंपरा प्राचीन कालसे चलती आयी है।

आद्य शंकराचार्यजीने सभी साधुओंका संधटन किया। इस संगठन के उपरान्त सभी संगठनका काम ठीक तरहसे चलनेके लिये आखाडाओंका प्रबंध किया गया। लेकिन आगे चलकर हिंदु तथा हिंदुधर्मियोंको नेस्तनाबूत करनेके लिये मुस्लीमोंने उनपर आक्रमण किया। मुस्लमानोंको रोखनेके लिये उन्हे प्रतिबंधित करने के लिये आखिरकार संन्यासीओंको अपना धर्म छोडकर हाथोमें शस्त्र उठाने पडे और फिर वे नग्न स्थितीमें, नागा अवस्थामें ही इधर से उधर आने जाने लगे उस कालसे आजतक नागा संन्यासी पर्वणीके शुभ अवसरपर त्र्यंबकेश्वरमे भगवान शिवजीके दर्शनके साथ साथ शाही स्नान करनेके लिये कुशावर्त तीर्थपर नग्न स्थितीमें आते रहते है। त्र्यंबकेश्वरमे आज पुराणा दत्त आखाडा, आवाहन आखाडा, अग्नि आखाडा, निरंजनी आखाडा, आनंद आखाडा, महानिर्वाणी आखाडा, अटल आखाडा, आदि कुल मिलाकर सात संन्यासीयोंके आखाडे और ठीक वैसे ही बडा उदासी मथा उदासी और निर्मल आखाडा इस तरहके साधुओंके आखाडे हुआ करते है।

इन आखाडाओंके भी कुछ आने रिवाज होते है। उन उसुलोंको समझकर ही पौ फुटनेके समय पहलेपहल नागा संन्यासियोकी शाही एवं सवारी आती है। उसके बाद दूसरी सवारी भी नागा संन्यासियोंकी रेहती है। इन संख्याओंकी यही विशेष खासियत हुआ करती है कि सुबह सुबह ही आसमान में सूरज का उदय होनेसे पहले ही वे अपना शाही स्नान करते है, और भगवानका दर्शन लेनेके बाद बडे उदासी स्नान करते है। उनके बाद नये उदासी स्नान करते है। आखिरमें निर्मल आखाडा शाही स्नान करनेके लिये आता है। इन सभी संन्यासीओंके शाही स्नानके बाद, दोपहरके बारह बजने के बाद सभी भक्तोको स्नान करने की अनुमती दी जाती है। सिंहस्थ कालमेंही कुशावर्त तीर्थपर स्नान के साथ साथ श्राध्द एवं पितृकर्मका भी विशेष महत्व बताया जाता है। प्रभु श्री. रामचंद्रजी जब बनवासके लिये आये थे ऊस कालावधीमें सिंहस्थके समय कश्यप ऋषीजीने त्र्यंबकेश्वरको जाकर राजा दशरथ का श्राध्दकर्म करने के लिये प्रभु श्रीरामचंद्रजी से कहा था इस बातका विशेष जिक्र पुराणग्रंथोमे किया गया है।। गंगा नदी के जलका प्रवाह जहाँ से शुरू होता है उस स्थान से लेकर नांदेड आब्जकतीर्थ तक और ठिक वैसेही राजमहेंद्रीतक बहनेवाली गोदावरी नदीमें स्नान करने का अपना एक विशेष महत्व माना जाता है। उस प्रदेशमे रहनेवाले लोग अपने नजदीक के तीर्थक्षेत्रपर जाकर गोदास्नान करके पुण्य पाकरही रहते है।

 

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