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श्री त्र्यंबकेश्वर देवस्थान

सुबह की मंगल बेला थी। शहनाईके मंगल एवं सुरीले स्वरोंसे श्री. क्षेत्र त्र्यंबकेश्वरमें स्थित भगवान शिवजीके त्र्यंबकराज मंदिरमें पूरा आसंमत गुंज उठा था। समारोह भी उतना ही परम पावन एवं मंगल था। सच्चिदानंदघन भगवान शिवजीके त्र्यंबकराज मंदिरमें शुक्रवारके महाशिवरात्रीके परमपावन शुभअवसरपर दिनांक १६ फरवरी १७८६ के दिन जीर्णोध्दारका काम पुरा हुआ था। इसी शुभअवसरपर शहनाईके सुरीले मंगल स्वरोंके कारण देवालयका माहौल प्रसन्नचित्त एवं आनंदकी अनुभूतिसे भर गया था। शहनाई चौघडोंके मंगल स्वरोंसे तुतारी और रणशिगंकी चढती हुई स्वरोंने भरसक साथ दी थी।

ज्योर्तिलिंग महामृत्युंजय श्री. त्र्यंबकराज मंदिरके जीर्णोध्दारका काम बिना रुकावट लेते हुए अव्याहत रुपसे पूरे ३१ सालोंतक चलमा रहा। श्री. त्र्यंबकराज मंदिरका संकल्प श्रीमंत नानासाहेब पेशवेजीने किया था। श्री. यशवंतरावजी हर्षे जो इस मंदिरके वास्तुशिल्पकार थे उन्होंने इस मंदिरकी रचनाका पूरा नक्शा तैयार किया था। पेशजीके प्रधान सचिव यशवंतराव भगवंत इनकी निगरानीमें दि. २६ दिसंबर के शुभ दिनके सुयोग अवसरपर इस मंदिरका काम शुरू हुआ था। उव्हीके सुपुत्र श्री गणेश नारायणजीके हाथोसे यह काम पुरा हुआ। कुल मिलाकर ७८६ कारागीर बिना किसी रुकावटके लगातार इस मंदिरकी निर्मितीके लिये ३१ सालोंतक कठोर परिश्रम कर रहे थे। राजस्थान स्थित मकरांना इस स्थानसे संगमरवरके पत्थर लाने के लिये कुल मिलाकर ४८ उँट ८५ हाथी और ११२ अश्व भोलेनाथकी मानों सेवा ही कर रहे थे। मंदिर निर्मितीके लिये उसकी खुबसुरतीमें चार चाँद लगानेके लिये उस समय के कालमे पुरे ९ लाखे रुपये का खर्चा आया. मंदिर जीर्णोध्दार शुभारंभ और जीर्णोध्दारका काम पूरा होनेका कालावधी का निर्देश उत्तर दिशा के प्रवेशद्वारपर संस्कृत भाषामें पत्थरोंकी लकीरोसे किया हुआ है।

पूरब - पश्चिम मतलब पूरबसे पश्चिम दिशातक २६५ फीट और दख्खन दिशासें उत्तर दिशातक लंबाई तथा चौडाई में रहनेवाला यह भगवान शिवजीका शिवालय है। जिसकी पूरब, पश्चिम, दख्खन, उत्तर इन चारों दिशांओं में प्रवेशद्वार रखा हुआ है। अध्यात्मकी दृष्टीसे देखा जाये तो पूरब दिशा का मतलब है शुरुवात तथा शुभारंभ, पश्चिम दिशाका सही मायनंमे मतलब है परिपक्वता। याने पूर्ण रूपसे समझदारी, दख्खन दिशाका मतलब है पूर्णत: होना। पूर्णत्व पाना और उत्तर दिशाका मतलब है साक्षात्कार एवं अनुभूति होना। मंदिर के सुरक्षाके हूतु बनाया गया । उत्तर दिशाकी तरफका प्रवेशद्वार सभी प्रवेशद्वारोंसे बहुत बडा एवं विशाल है। इसे मंदिर का महाद्वार भी कहा जाता है। भगवान शिवजीके दर्शन के लिये आये हुए श्रध्दालू भक्त इस महाद्वारसेही मंदिर में प्रविष्ट होते है। उत्तर दिशाकी तरु रहनेवाले इस महाद्वारपर ३८ x १५ फीट फीट का नगारखाना है. साथ साथ पश्चिम और दख्खन दिशाकी और रहनेवाले प्रवेशद्वाके अंदर फरसबंदी बनायी गई है। और समकोनकी परीघकी परिसरमें भगवान शिवजीकी पूजाके लिये एक बहुतही खुबसुरत तालाब की रचना की हुई है। उसी तालाबसे पाणी लेकर भगवान शिवजीके ज्योर्तिलिंगकी पूजा की जाती है। जिसे अमृतकुंड इस संज्ञासे जाना जाता है। इस अमृतकुंडकी गहिराई मंदिरकी उँचाईसमान गहरी है। नीचे जो विशाल भूमि है उसके बीचोबीच ही प्रधान देवालय की स्थापना की है। इस देवालय की रचनापूर्वाभिमूख होने के साथ साथ प्रधान प्रासादकी लंबाई पूरबसे पश्चिमतक कुल मिलाकर १६० फीटकी है, और दख्खनसे उत्तर दिशातक चौडाई याने की घेरा १३१ फीटकी बनाई हुई है। फरसबंदीसे लेकर मंदिरकी ऊँचाई ९६ फीटकी होने के साथ साथ मंदिरके घुमटका जो गोलाकार है उसका परीघ कुलमिलाकर १८५ फीटका है। इस विशाल मंदिरके खुबसुरतीमे चार चाँद लगानेवाले प्रासादपर तीन सुवर्णकलशोंकी और वृषभचिन्हांकित सुवर्णध्वजकी स्थापना पेशवोंके सरदार अण्णासाहब विंचुरकरजीने ५ अक्टुंबर १९७२ इस शुभदिनपर की थी।

प्रधान मंदिरके प्रवेशद्वाराके बिलकूल सम्मुख नंदीका मंदिर है। . इसी देवालयके पुर्वाभिमुख और दक्षिणोत्तराभिमुख ऐसे तीन प्रवेशद्वार बिठाये गये है। पुरब दिशाकी तरुसे प्रधान प्रवेशद्वारसे भीतर जानेके बाद हर किसी श्रध्दालू भक्तका मन लुभानेवाला निहायवही खुबसुरत सभामंडप एवं विशाल बंदिस्त हॉल है। जिसके ऊंचाईपर मेघडंबरी आकारका छाता है। उसके बीचोबीच खुबसुरत संगमरवरमें कुशल कारागिरीसे बनाया हुआ बारह फीटका चौरस बनाया गया है। जिसपर निहायतही खुबसुरत संगमरवरमे गनाया गया कछुआ है। भगवान शिवजीके पवित्र एवं पावन दर्शन लेते समय कछुऐ की तरह काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मत्सर इन षडिरिपुंसे अगर हम परावृत्त हो जाये उनसे अगर हम सचमुच मुक्त हो जाये। कछुऐकी तरह काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मत्सररुपी षडरिंपुके पाँवोंकी अगर अंदरकी तरफ रुख कर दे तो नि:संदेह रुपसे भक्तजनोपर भगवानकी किरपा हो ही जाती है और षडरिंपुसे मुक्त भक्त परमात्माके करीब पहुँच जाते है शायद यही सीख हमे प्राप्त होती है।

पश्चिम दिशाकी तरफ प्रधान देवालयका अंर्तगृह है। सभामंडपके कोनेमे भैरवादिकोंकी खुबसुरत मूर्तियाँ बिठाई गयी हुई है। पश्चिम दिशाकी तरुसे पाँच सिडीया उतरकर गर्भगृहमें जब हम प्रवेश करते है तब हमे संगमरवर की खुबसुरत पत्थरसे बनायी गयी हुई फरसबंदीपर जो परिवर्तित की गयी है उसके अग्रस्थानपर वालुकामय पत्थरसे बनायी हुई स्वयंभी शालुंका है। उसमे अंगुष्ठाकारकी आकारमें ब्रम्हा, विष्णू, महेशकी ३ बाणलिंगोंकी रचना अंर्त़भूत है। महेशजीके बाणलिंगसे अव्याहत रूपसे बहनेवाला गंगाप्रवाह अपनी एक विशेषता लेकर भक्तोंको संतोषकी परम अनुभूति देता है, और इस स्वयंभू ज्योर्तिलिंगकी पुरब दिशाकी तरफ पार्वती माताकी संगमरवरमें बनायी हुई खुबसुरत मुरत है, जो भक्तोका मन अवसर मोह लेती ही है।


ब्रम्हगिरी

सभी संतसाधु पुरूषोंने ब्रम्हगिरीका महात्म्य अपने अपने लफ्जोमें बताया है। साधकों को यमयातनाओंसे मुक्ति दिलानेवाला ब्रम्हगिरी इन बेमिसाल लफ्जोंमे बयान करनेवाले संतश्रेष्ठ नामदेव महाराजजीने ब्रम्हगिरीकी महानता इन लफ्जोमें बयान की हे। अगर एक बार साधक ब्रम्हगिरीका दर्शन करे तो उसे नि:संदेह रूपसे यमयातनाओंसे छुटकारा मिल ही जाता है। प्राचीन काल मे पुराणग्रंथोसे ऐसे ही लिखा गया है, कि ब्रम्हगिरीका एक बार दर्शन कर लेनेसे इन्सांन को सभी पापोंसे मुक्ति मिलती है। पापोंसे मुक्ति दिलानेवाला तथा मनूष्य मात्रको दु:खोसे छुटकारा दिलानेवाला ब्रत्हगिरी सभी इन्सानोंका पावन करनेवाला तो है ही.......

ब्रम्हगिरी यह किला समंदरकी किनारपट्टीसे ४२४८ फीटकी ऊँचाईपर स्थित है और उसका घेरा दस मीलका है। किलेके माथेपर चार मीलतक सभी औरसे फैली हुई ३०० से ४०० फीट ऊँचाई की चोटी है। साथ साथ किलेपर ऊपर पहुँचनेके लिये सिर्फ दो ही दरवाजे है। तिसरा एक भी प्रवेशद्वार नही है। जिससे मिलेकी अंदरुनी हिस्सेमे कोई जा सके प्रधान दरवाजा दख्खन दिशाकी तरफ रखा गया है। जिस दरवाजेसे अंन्दर रहनेवाले सैनिंकोंको अनाज पहुँचाया जाता था। किलेके माथेपर अब भी किलेके कुछ अवशेष दिखाई देते है। वहाँसे अंन्दर जाने के बाद किलेकी सरहद शुरु हो जाती है। उँचाईमे उत्तर दिशाकी किलेका विभाग दख्खन दिशाकी विभागसे उँचाईमें कम होकर भी उस विभागकी चोटी बेहद उपरकी तरफ जानेवाली सीधी उँची ही है। यहाँपर अनगिनत तहखाने है। तथा रहनेके निवासस्थान पत्थरोमें किये गये है। इ.स १६३६ में शहाजीराजे यही किला खान जमानेके हाथों साँप दिया था। इ. स. १७२० तक यह किला मुसलमानोंके कब्जेमें था। मुघलोका अमल इस किलेपर १७२० तक था। इसके उपरांन्त १७५५ मे यह किला निजामके चंगुलसे छुडवाकर मराठा सरदारोंने इस किलेपर अपना कब्जा जमाया। इ.स्‍ा. १८१८ में इस किलेपर ब्रिटीशोंने अपना हक जताया और यही ब्रम्हगिरी किला आजके दिनोंमे भारत सरकार के कब्जे है। अब इस विभागपर भारत सरकार का अंमल चल रहा है।

किलेकी सद्यस्थिती इस किलेपर जानेके लिये उत्तर दिशाकी तरफसे करांचीमे रहनेवाले दानी लालचंदसेठजीने ४०० सिढीयोंका खर्चा उठाया है। यही ४०० सिढीयाँ चढने के बाद किलेपर उँच सरल जमी लग जाती है। रास्तेमेंही कोटी नाम का एक तीर्थ लगता है। किलेके पिछवाडेमें उत्तर दिशाकी तरु श्री भगवान शिवजीका प्राचीन देवालय दिखाई देता है, और इसी विशेष जगहपर गोदावरी नदीका उगमस्थान है। उसी जगहपर बावडी जैसे एक कुंड दिखाई पडता है। किलेकी उत्तर दिशाकी तरुफही भगवान शिवजीने क्रोधीत होकर अपनी मस्तीष्कपरकी जटा निकालकर धरती पर जोरसे पटकी थी वही जगह एवं विशेष स्थान भक्तोंको नजर आता है। वही जगह एक पत्थरका हिस्सा ही बन गयी है। जिसमे दो जगहपर गहराई छायी हुई दिखाई देती है,और वही ही भगवान शिवजीके घुटनोंके चिन्ह है और साथ साथ इस पत्थरपर कुछ रेखाएँ भी दिखाई देती है। उन्हे ही भगवान शिवजीकी जटा की संज्ञा दी गई है। उन रेखाओंको भगवान शिवजीकी जटाऍ कही जाती है।

गंगाद्वार

गंगाद्वार यही पुनीत पवित्र स्थान ब्रम्हगिरीके दर्शन लेनेके लिये सिढीयोंकी जो शुरूवात की गयी है उसी जगह पर है। ७५० सिढीयाँ चढकर उपर जाना पडता है। ब्रम्हगिरी परबतसे बहनेवाला गंगानदीका प्रवाह पहले पहल नजर आता है तो इसी जगहपरही। इसी वजहसेही इस जगहको गंगाद्वार नामकी विशेष संज्ञा दी गयी है। यहॉपर गंगा की मूरत दिखाई देती है, और साथ साथ गोमुखसे आनेवाली गंगाकी जलधाराओंका प्रवाह भी नजर आता है। गंगा के मूरतके पासही गुफा जैसा दिखाई देनेवाला एक कुंड है जिसे वराहतीर्थ नामसे जाना जाता है। वराह तीर्थ की उत्तर दिशाकी तरु कांलंबिका देवी का मंदिर दिखाई पडता है। इस पर्वतपठारके उत्तर कदशाकी विभागमे अष्टयोत्तर शत शिवलिंग है और साथ साथ गोरक्षनाथ गुफा और मच्छिंद्रनाथ गुफाका विशेष स्थान है। इस स्थानकी विशेषता एवं खासीयत यही कही जाती है। या इस जगहकी महिमा यही है संत श्रेष्ठ निवृत्तीनाथ महाराज इन्हे गोरक्षनाथ गुफामें ही गाहिनीनाथ जीसे आत्मग्यानकी प्राप्ती हो गयी। रास्ते में रामकुंड और लक्ष्मणकुंड नामके दो तीर्थ है। गंगाद्वारतक जाने के लिये बम्बई निवासी श्रीमान पुण्यात्मा हसंराज करमसीजीने ७५० सढियोंका खर्चा देकर यात्रीयोंकी सुविधा की है।


कुशावर्त तीर्थ

कुशावर्त तीर्थ - श्री त्र्यंबकेश्वरका स्थान महात्म्य कोई बयान नही कर सकता। समुचे भारतवर्षामें भगवान शिवजीके जो बारह ज्योर्तिलिंग है उनमेसे एक ज्योर्तिलिंग त्र्यबंकेश्वर स्थित त्र्यंबकराज है। जिनके अमृतमय मंगल दर्शनसे हर भक्त श्री त्र्यंबकेश्वर पधारते रहते है। हजारो लाखोंकी तादादमें भगवान शिवजीके महन्मंगल दर्शन्‍ लेनेके लिये, आपनी जिदगी सुखशांतीसे परिपूर्ण बनाने के लिये, कुशावर्तपर तीर्थस्थान का महात्म्य महसूस करनेके लिये, ब्रम्हगिरीकी परिक्रमा करनेके लिये इसके साथ साथ संतश्रेष्ठ निवृत्तीनाथ महाराजके समाधीके दर्शन करनेके लिये श्रध्दालू भक्त यहॉपर अवसर आते रहते है। सभी तरहकी बीमारीयाँ दु:ख नष्ट करनेके लिये, पापोंका हरन होनेके लिये, तथा श्राध्दविधी एवं पितृकर्म करने के लिये हमेशा लोगोंकी भीड लगी रहती। पिछले जमानेंमें किये हूए पुण्यकर्मोंके कारण ही इन्सानको इस ज्योर्तिलिंगका दर्शन लेनेकी मनमें ख्वाहीश पैदा होती है।

शास्त्रकारोंने भी त्र्यंबकेश्वरके प्रमुख स्थान कुशावर्त तीर्थको अन्यय साधारण महत्व दिया है। इस बातकी प्रधान वजह यही है कि गौतम ऋषींजीने अपने अभिमंत्रित दर्भोंसे गंगाके पानीका जलौघ रोक दिया और उसी जगह पर गंगानदीकी पावन जलधारामें मंत्रोच्चारसहित स्नान कर के गोहत्या पातक से मुक्ती मिलवायी। इसी वजहसे इस तीर्थका कुशावर्त तीर्थ यही संज्ञा दी गयी। इसी नामसे यही तीर्थ पूरी दुनियामें मशहुर हो गया. यहाँ इस तीर्थमे स्नान करनेसे गौतम ऋषीको गोहत्याकी पापसे मुक्ती मिल गई। इसी स्थानके महात्म्यके कारण ही गंगा नदी गोदावरी नदीकी संज्ञासे पहेचानी जाने लगी। जिस तरह पितापुत्र रिश्तेसे एकही होते हुए भी जन्मदाता पिता ही श्रेष्ठ माना जाता है। ठीक उसी तरह उगमसे लेकर सागरतक गोदावरी नदी सभी स्थानपर हर एक जगहपर पवित्र एवं पावन करनवाली मानी गयी तो भी इस नदीका उगमस्थान अपना एक विशेष महत्व रखता ही है।

संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर माऊलीने कहा है की सांबसदाशिव भगवान साक्षात शिव भी उसी ज्ञानमार्ग पर चलनेवाले पांतस्थ ही है। अगर यही बात सच है तो स्वाभाविक तौरसे गजानन महाराज, श्री. स्वामी समर्थ, श्री त्र्यंबकराजके बिलकुल नजदीक आ गये है। उनकी स्वाभाविक चाहत के अनुसार त्र्यंबकेश्वरके प्रवेशद्वारके पासही श्री. गजानन महाराजजी का बहुतही खुबसुरत बेहतरीन मंदिर तो है ही साथ साथ वहाँ धर्मशाला भी है। ठीक उसी तरह श्री. स्वामी समर्थका बेमिसाल निहायत खुबसुरत मंदिर भी वहाँ है और दोनो स्थानपर यात्रीयोंके लिये निवास स्थानकी सुविधाकी उपलब्धी की गयी है। ठीक उसी तरह नीलपर्वत नामकी चट्टानभी निहायत ही देखनेलाय‍क है। जो त्र्यंबकेश्वरका पर्यटन क्षेत्र भी बन गया है. यहापर श्री. निलांबिका देवी विराजमान है जो साक्षात पार्वतीका स्वरूप है।

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